"पूर्ण पीड़ित और माँगों की राजनीति" का फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित, लेखक अल-कुर्द ने पश्चिमी पीड़ा कथानक पर उठाया सवाल
फ़िलिस्तीनी लेखक, कवि और पत्रकार मुहम्मद अल-कुर्द की पुस्तक "पूर्ण पीड़ित और माँगों की राजनीति" का फ्रेंच अनुवाद इस सप्ताह प्रकाशित हुई। वे पूर्वी यरूशलम के शेख़ ज़र्रा में पले-बढ़े और उनकी लेखनी में बचपन में परिवार को इज़रायली बसने वालों द्वारा बेदखल किए जाने का अनुभव गहराई से समाया हुआ है। France 24 के "पर्सपेक्टिव" कार्यक्रम ने इस सप्ताह लगभग आठ मिनट का साक्षात्कार प्रसारित किया।
फ्रेंच संस्करण के प्रकाशन से फ़िलिस्तीनी लेखक, कवि और पत्रकार मुहम्मद अल-कुर्द की पुस्तक "पूर्ण पीड़ित और माँगों की राजनीति" फ्रांसीसी पाठकों के समक्ष आ गई है। France 24 के अंग्रेज़ी चैनल के "पर्सपेक्टिव" कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, अनुवाद पिछले सप्ताह जारी किया गया।
पुस्तक का शीर्षक स्वयं एक घोषणा है। "पूर्ण पीड़ित" और "माँगों की राजनीति" को साथ रखकर यह उस समालोचनात्मक पूछताछ की ओर संकेत करता है कि पश्चिमी मीडिया कैसे फ़िलिस्तीनियों को "कैसे पीड़ित होना चाहिए" यह निर्धारित कर सहानुभूति अर्जित करने का प्रशिक्षण देता है। यह पूछताछ निराधार नहीं है — अल-कुर्द पूर्वी यरूशलम के शेख़ ज़र्रा में पले-बढ़े हैं और वे स्वयं उस घटना के पक्षकार हैं जिसमें बचपन में उनके परिवार को इज़रायली बसने वालों ने घर से बेदखल किया था।
शेख़ ज़र्रा बेदखली का मामला लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग का केंद्र रहा है और बाहरी दुनिया के लिए बस्ती विस्तार तथा फ़िलिस्तीनियों के व्यवस्थित विस्थापन को समझने का प्रतीकात्मक उदाहरण भी है। उस समुदाय के फ़िलिस्तीनी परिवार इज़रायली अदालतों और बसने वालों के संगठनों की पहल पर पीढ़ियों से रहते आए अपने घर छोड़ने को विवश हुए, कुछ मामलों ने 2021 के आसपास बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जगाया। अल-कुर्द का परिवार इन्हीं में से एक था।
France 24 के "पर्सपेक्टिव" कार्यक्रम ने उनका लगभग आठ मिनट लंबा साक्षात्कार प्रसारित किया। कार्यक्रम ने अपनी रिपोर्ट में इस संवाद का विषय इस रूप में रखा कि अल-कुर्द "फ़िलिस्तीनी पीड़ा को देखे जाने के तरीके" को कैसे चुनौती देते हैं। रिपोर्ट में साक्षात्कार के दौरान उनके विशिष्ट तर्कों को सीधे नहीं प्रकट किया गया, लेकिन कार्यक्रम का प्रसारण और फ्रेंच संस्करण की नई पुस्तक का प्रकाशन एक ही समय पर होने का अर्थ है कि उनका विवेचन भाषाई सीमाओं को पार करते हुए नए दर्शकों तक पहुँच रहा है।
अल-कुर्द पहले ही कविता संग्रह "Rifqa" से अरबी और अंग्रेज़ी साहित्य जगत में अपनी ख्याति स्थापित कर चुके हैं। कविता से राजनीतिक विश्लेषण तक, व्यक्तिगत स्मृति से अंतरराष्ट्रीय जनमत तंत्र की समीक्षा तक, वे लगातार एक ही प्रश्न पर ज़ोर देते रहे हैं: फ़िलिस्तीनियों की पीड़ा पश्चिमी नज़र में कैसे प्रवेश करने दी जाती है, और उसे स्वीकार्य या अस्वीकार्य रूप में कैसे ढाला जाता है। यही प्रश्न फ्रेंच अनुवाद के प्रकाशन के साथ फ्रांसीसी भाषी दुनिया की पठन-सूची में शामिल हो गया है।
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