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अमेरिका ने पाँच भारतीय आईटी कंपनियों की पीईआरएम प्रमाणन पर रोक लगाई, वेंस के 'ठेकेदार गुलाम' वाले बयान पर नई दिल्ली ने औपनिवेशिक धारणा के साथ दिया जवाब

द हिंदू इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों—जिनमें इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, कॉग्निज़ेंट और एचसीएल शामिल हैं—के स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम पर रोक लगा दी है, तथा उपराष्ट्रपति वेंस ने विदेशी कर्मचारियों को 'ठेकेदार गुलाम' कहा। भारत के विदेश मंत्रालय ने 9 अक्टूबर को कड़ी भाषा में बयान जारी कर इन टिप्पणियों को 'बेबुनियाद' और 'अत्यंत अपमानजनक' करार दिया, तथा कहा कि इनमें 'दर्दनाक इतिहास और औपनिवेशिक धारणा की झलक' है। यह कदम ऐसे समय सा

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द हिंदू इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों की स्थायी श्रम प्रमाणन (पीईआरएम) परियोजना पर रोक लगा दी है, जिनमें पाँच भारतीय आईटी बहुराष्ट्रीय कंपनियों—इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, कॉग्निज़ेंट और एचसीएल—के नाम हैं, जबकि फ्रांसीसी कंपनी कैपजेमिनी तथा अमेरिकी कंपनियाँ माइक्रोसॉफ्ट और एडोब भी इस सूची में हैं। श्रम मंत्री कीथ सोंडरलैंड ने 8 अक्टूबर को उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में इन कंपनियों पर 'हानिकारक व्यवस्था' के ज़रिए कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को लाकर अमेरिकी कामगारों को बाहर करने का आरोप लगाया, जिसे उन्होंने 'अमेरिकी कामगारों के साथ धोखा' करार दिया।

वेंस की मौके पर की गई टिप्पणी और भी आक्रामक थी। "आप विदेश से ठेकेदार गुलाम लाते हैं और अमेरिकी कामगारों को निकाल देते हैं। अगर आप कोई कंपनी हैं, तो आप अमेरिकी कामगारों का वेतन घटाकर उन लोगों को रखकर मोटा मुनाफा कमाते हैं, जिन्हें सच कहें तो अमेरिका में होना ही नहीं चाहिए," उन्होंने कहा। इसी टिप्पणी पर 9 अक्टूबर को भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ी भाषा में बयान जारी कर पलटवार किया।

"इस तरह का वर्णन पूरी तरह बेबुनियाद है और इसमें यह उपेक्षा की गई है कि अमेरिका में रह रहे भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित हैं तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला एक समूह हैं," भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा। बयान में आगे कहा गया कि 'दर्दनाक इतिहास और औपनिवेशिक धारणा' से भरी शब्दावली का प्रयोग 'अत्यंत अपमानजनक' है, तथा अमेरिका को याद दिलाया गया कि वह स्वयं 'कई पीढ़ियों के प्रवासियों द्वारा आकार लिया गया देश' है।

द हिंदू इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, पीईआरएम कार्यक्रम कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड आवेदन करने की अनुमति देता है, बशर्ते उन्हें श्रम विभाग को यह साबित करना हो कि अमेरिका में समान योग्यता वाला स्थानीय कर्मी उपलब्ध नहीं है। 2009 से अब तक इस कार्यक्रम के तहत 2.3 लाख से अधिक एच1बी वीज़ा और एक लाख स्थायी निवास आवेदन मंज़ूर हो चुके हैं, जबकि वर्तमान में लगभग 70 प्रतिशत एच1बी वीज़ा धारक भारत से हैं।

श्रम प्रमाणन पर यह रोक भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों पर पहले से दबाव की स्थिति में लगी। द हिंदू इंटरनेशनल ने सूत्रों के हवाले से बताया कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने पिछले सप्ताह वाशिंगटन में हुई बैठक के बाद कहा कि मुक्त व्यापार समझौता 'नज़दीक नहीं' है, और भारतीय वित्त मंत्री सीतारमण ने भी माना कि वार्ता 'ठप' पड़ गई है। इसी बीच, नई दिल्ली पर रूस और ईरान प्रतिबंध कानून के तहत संभावित शुल्क का खतरा मंडरा रहा है—इस कानून में बड़ी मात्रा में रूसी तेल आयात करने वाले देशों पर अधिकतम 100 प्रतिशत तक अमेरिकी शुल्क लगाने का प्रावधान है। अमेरिकी राष्ट्रपति से इस पर 18 अक्टूबर को निर्णय लेने की उम्मीद है, जो नवंबर की शुरुआत में होने वाले मध्यावधि चुनाव से महज़ दो सप्ताह पहले की बात है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि प्रमाणन पर रोक 'दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में सहायक नहीं' है। श्रम वीज़ा और ऊर्जा आयात शुल्क—दोनों ही स्तरों पर एक साथ सख्ती वाशिंगटन में बैठे नीति-निर्माताओं की ओर से है, और यह सख्ती झेल रही है नई दिल्ली, जिसकी आईटी सेवा निर्यात की जीवनरेखा और ऊर्जा खरीद की स्वायत्तता दोनों ही अमेरिकी मर्ज़ी पर निर्भर हैं। बयान ने इस क्षण को 'औपनिवेशिक धारणा' के रूप में रेखांकित किया है, और जिस ओर वह इशारा कर रहा है वह केवल शब्दों तक सीमित नहीं है।

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