ट्रंप के 5,000 डॉलर के ‘डिविडेंड’ का वादा: खरबों की बाज़ी के पीछे कानून, कर्ज और महंगाई की तीनहरी खाई
ट्रंप ने वादा किया है कि नवंबर के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन जीतते हैं तो हर अमेरिकी वयस्क को 5,000 डॉलर दिए जाएंगे। लेकिन 40 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के राष्ट्रीय कर्ज, 3.4 प्रतिशत महंगाई और ट्रंप के शुल्कों को असंवैधानिक ठहराए जाने के बीच यह वादा कानूनी मंजूरी, वित्तपोषण और कीमतों पर असर के तीन मोर्चों पर अधर में है।
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में वादा किया है कि यदि रिपब्लिकन पार्टी नवंबर के मध्यावधि चुनाव में प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो वह हर अमेरिकी वयस्क को 5,000 डॉलर देंगे। France 24 के अनुसार, अमेरिका में 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लगभग 276.8 मिलियन वयस्क हैं। इस हिसाब से, कुछ समर्थकों द्वारा ‘ट्रंप डिविडेंड’ कहे जा रहे इस भुगतान की कुल लागत लगभग 1.384 ट्रिलियन डॉलर होगी, जो महामारी के दौरान दिए गए करीब 814 अरब डॉलर के तीन राहत चेकों के कुल योग से लगभग 1.7 गुना है।
यह वादा अमेरिकी सार्वजनिक वित्त पर सबसे भारी दबाव वाले दौरों में से एक के बीच आया है। अमेरिकी राष्ट्रीय कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। France 24 ने सेंट लुईस फेडरल रिजर्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि महामारी के दौरान राजकोषीय प्रोत्साहन ने महंगाई में लगभग 2.6 प्रतिशत अंक का योगदान दिया था। वहीं अमेरिकी उपभोक्ता महंगाई अब भी 3.4 प्रतिशत पर है, जो फेडरल रिजर्व के 2 प्रतिशत के दीर्घकालिक लक्ष्य से काफी अधिक है; इस दबाव के एक हिस्से को तथाकथित ‘ईरान युद्ध’ से पैदा हुए ऊर्जा झटके से जोड़ा जा रहा है। ऐसे समय में उपभोक्ताओं के हाथों में एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अतिरिक्त क्रयशक्ति डालना कीमतों को और बढ़ाने की लगभग गारंटी होगा। अर्थशास्त्रियों के शब्दों में यह ‘हेलिकॉप्टर से पैसा बरसाने’ जैसा होगा, जबकि जीवन-यापन की बढ़ती लागत का बोझ आम तौर पर निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों पर अधिक पड़ता है।
वित्तपोषण का रास्ता इस वादे की सबसे कमजोर कड़ी है। France 24 के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में अमेरिकी शुल्क से होने वाली आय 195 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची, लेकिन यह रकम नए वादे के खर्च का केवल लगभग सातवां हिस्सा ही पूरा कर सकती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में ट्रंप के प्रमुख शुल्कों को असंवैधानिक ठहराया था, जिसके बाद वित्त मंत्रालय को आयातकों को कर लौटाने और उस पर ब्याज देने होंगे। France 24 द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, मई से जुलाई के बीच शुद्ध शुल्क आय नकारात्मक हो गई। जब अमेरिका के लिए ‘कमाई’ का साधन बताई गई शुल्क-व्यवस्था को न्यायपालिका ने ही खारिज कर दिया हो और उससे आने वाली शुद्ध रकम भी नकारात्मक हो, तब 1.4 ट्रिलियन डॉलर का खर्च सामान्य बजटीय रास्तों से पूरा करना लगभग असंभव है।
कानूनी स्तर पर भी कड़ी सीमाएं हैं। France 24 ने बताया कि संघीय कानून वोट के बदले भुगतान देने पर रोक लगाता है, हर खर्च के लिए कांग्रेस की बजटीय मंजूरी जरूरी है और अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को कानूनी विनियोग के बिना वित्त मंत्रालय की रकम खर्च करने से रोकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ट्रंप पहले शुल्क आय से 2,000 डॉलर के चेक और संघीय कर्मचारियों की छंटनी से हुई बचत से 5,000 डॉलर के चेक देने का वादा कर चुके हैं; दोनों वादे पूरे नहीं हुए।
डेमोक्रेटिक पार्टी की आलोचना इस वादे के सौदेबाजी वाले चरित्र पर सीधे निशाना साधती है। France 24 के अनुसार, कैलिफोर्निया के गवर्नर और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में संभावित डेमोक्रेटिक उम्मीदवार गैविन न्यूसम ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा: ‘तुम्हें अपनी युद्ध के जरिए और अधिक बीमार और गरीब बनाने के बाद, डोनाल्ड ट्रंप अब करदाताओं के पैसे से दिए गए “खूनी धन” से तुम्हारा वोट खरीदना चाहते हैं।’ मैरीलैंड के डेमोक्रेटिक सांसद जेमी रैस्किन ने इस वादे को कर्ज के स्तर से जोड़ते हुए कहा: ‘राष्ट्रीय कर्ज में खरबों डॉलर जोड़कर और उसे इतिहास में पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर पहुंचाने के बाद, ट्रंप अब प्रस्ताव दे रहे हैं: अगर हम रिपब्लिकन नियंत्रण वाली कांग्रेस चुनें, तो वह हर व्यक्ति को 5,000 डॉलर की राजनीतिक रिश्वत देंगे।’
इस वादे को पूरा करने का रास्ता हर तरफ से अधर में है: कानूनी रूप से इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी चाहिए, वित्तीय रूप से शुल्क आय को न्यायिक फैसले से खारिज किए जाने के ऐतिहासिक उलटफेर का सामना है और कीमतों के स्तर पर महंगाई बढ़ने का सीधा खतरा है। इसके अलावा, इसी तरह के दो वादे पहले ही विफल हो चुके हैं। यदि खरबों डॉलर का यह वादा अंततः कुछ हद तक कर्ज लेकर पूरा किया गया, तो उसका ब्याज और महंगाई की लागत आम परिवारों और आने वाली पीढ़ियों को उठानी होगी, जबकि वे बढ़ते करों और कीमतों का बोझ झेलेंगे।
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